कुछ मजबूरियाँ थी उसकी मजबूर हो रही थी,
चंदा से एक चकोर आज दूर हो रही थी।
मिलन की प्यारी प्यारी यादें सब समेट ली उसने
यादों की चादर इकट्ठा करके समेट ली उसने
अंतिम पल में साथ बैठकर तड़फ उठी,
अनुनाद से दिल की धड़कन धड़क उठी।
शांत चित्त से चंदा को निहार रही थी वो,
खुले आकाश में आज विहार रही थी वो।
एक प्रश्न दोनो के ज़ेहन में छाया था,
फिर से कभी मिलेंगे क्या निर्धारित नही हो पाया था।
थी वियोग की चिंगारी जो जलने वाली थी,
एक चकोर अपने अस्तित्व में मिलने वाली थी।
थी अनमोल घड़ी दोनो को ज्वार बनी चकोरी थी,
संग रहेंगे मिल जीवन भर हसरत हुई ना पूरी थी।
उस चंदा की भी हालत जैसे बादल से ढकने वाली थी,
उसके आगे की राहें भी रात अंधेरी काली थी।
अब ना कभी वो चंदा होगा ना होगी वही चकोरी,
दोनो के पावन ह्रदय में चुभतीं रहेगी ये दूरी।
आकाशमंडल में भी एक नया प्रकाश छाने लगा,
प्रातःकाल बेला थी साम्राज्य सूर्य का आने लगा।
कुछ मजबूरियाँ थी उसकी मजबूर हो रही थी,
चंदा से एक चकोर आज दूर हो रही थी।

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