भगवान यानि ब्रह्माण्ड का दिमाग क्या है…
आखिर भगवान क्या है, आखिर भगवान कैसा दिखता है, वो कैसे काम करता है…
ये सवाल आपमें से हर किसी के दिमाग में कभी न कभी आया ही होगा, चाहे आप किसी भी धर्म से नाता रखते हों, चाहें आप किसी भी देश में रहते हों, आप एक बात तो मानते ही होंगे कि कोई तो ऐसी शक्ति है जिसे हम भगवान कहते हैं और वही इस ब्रह्माण्ड को चलाती है, लेकिन हमारे मन में ये ख्याल भी हावी हो जाता है कि जो चीज न दिखती है और न ही उसका कोई सुबूत है तो हम उसे सच कैसे मान लें…
तो आज हम आपको वैज्ञानिक तर्क और धार्मिक आस्था से यही बताएँगे कि ब्रह्माण्ड का दिमाग यानि कि भगवान् कैसे काम करते हैं.
दरअसल अगर हम बात करें हिन्दू धर्म की या इस्लाम धर्म की, इसमें हमें यही बताया जाता है कि भगवान मौजूद हैं और हमसे वही अपने काम करवाता है, लेकिन अगर हम वैज्ञानिक तर्क से देखें तो हमे कोई भी सुबूत नजर नही आता कि भगवान है, और कोई चीज कैसे हम पर असर डाल सकती है. लेकिन हम इसका जवाब भी विज्ञानं में ही ढूंढ सकते हैं, अगर हम क्वांटम फिजिक्स में देखें तो आज माना जाता है कि सबसे छोटी इकाई परमाणु नही रही जिसे हम ढूंढ पाये हैं, उससे भी छोटे पार्टिकल्स यानि टुनटोन्स और इलेक्ट्रोल्स पर भी फिजिसिस उपयोग कर रहे हैं, और उनका भी यही मानना है कि इससे भी छोटे पार्टिकल्स क्वाक्स और लेप्टोन्स ढूंढे जा चुके हैं, पर हो सकता है कि उनके अंदर उससे भी छोटे पार्टिकल्स हों, लेकिन अगर हम इन पार्टिकल्स की ही बात करें, तब भी जो ब्रह्माण्ड हमे खाली नजर आता है वो असल में खाली नही है बल्कि सूक्ष्म स्तर पर वो इन पार्टिकल्स से जुड़ा हुआ है, यही पार्टिकल्स और वेव्स उन जगहों पर भी हैं जहाँ पर कुछ नही है, जब अंतरिक्ष में कुछ नही होता तब भी वहां से लाइट ट्रैवल करती है, यह लाइट पार्टिकल ऑफ़ फेव् के रूप में ट्रैवल करती है जिसे फोटोज कहते हैं, यानी उस खाली जगह पर भी पार्टिकल्स होते हैं और हर चीज एकदूसरे से सूक्ष्म स्तर से जुड़ी हुयी है, यहीं पर वैज्ञानिकों का मानना है कि इन्ही में हमारे ब्रह्माण्ड के नियम बने हुए हैं, यानि हम सब भौतिक चीजें एक ही चीज से बनी हुयी हैं, और वही चीजें हम पर अपने नियम चलाती हैं, हम पार्टिकल माने या उससे भी सूक्ष्म कण जिसे खोजा नही जा पाया है, उसी में ब्रह्माण्ड के नियम भी बनते हैं और वहीं पर ब्रह्माण्ड का दिमाग भी है, यही दिमाग पुरे ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है, हर चीज में यही है और ये एकदूसरे से जुड़ा भी हुआ है, इसी का वर्णन हिन्दू धर्म के ग्रंथों में भी मिलता है और ऐसा ही इस्लाम में भी बताया गया है, चाहें और भी धर्म हों, सबमें एक ही बात सामान्य है कि उसमे बताया जाता है कि हर जगह भगवान है, हमारे अंदर भी भगवान है और बाहर भी, जहाँ भी कुछ नही है वहां पर भी भगवान हैं, इसी बात को वैज्ञानिक भी मानते हैं कि बाहर भी वही पार्टिकल्स हैं और अंदर भी वही जुड़े हुए हैं. धर्म हो या विज्ञानं, नाम अलग-अलग मगर कहने का मतलब वही है.
लेकिन सवाल यही है कि क्या हम भगवान को मानते भी हैं, अगर हम सूक्ष्म स्तर पर एक ही हैं तो हम अलग-अलग क्यों हैं, क्यों हम अपने-अपने धर्म को अच्छा कहते हैं, पर भगवान को अच्छा नही कहते, क्यों हमे लगता है कि भगवान सिर्फ एक ही धर्म के लोगों को प्यार करता है, बाकियों को नही, अगर भगवान ने सबके लिए एक ही नियम बनाये हैं तो क्यों हमने अपने अलग नियम बना लिए….

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