प्रदूषित पर्यावरण का प्रतिफल भोगने लगी है पृथ्वी


 प्रदूषित पर्यावरण का प्रतिफल भोगने लगी है पृथ्वी-



धरती जल रही है, समुद्र, नदियां, झीलें, तालाब, प्रदूषित हो चुके हैं. जंगल रेगिस्तान में तब्दील हो रहे हैं, जंगलों के पशु-पक्षी ख़त्म हो रहे हैं.

खेत सूने पड़े हैं। मौसम का हाल यह है कि कहीं भयंकर बाढ़ तबाही मचा देती है तो कहीं सूखा हाहाकार मचा देता है। तूफान ऐसा उठता है कि अमेरिका की बहुमंजिली इमारत आसमान जाती है। बाढ़ ऐसी आती है कि लाखों लाख लोगों का अता पता नहीं चलता। बादल ऐसे फटता है कि हजार फीट ऊंचे पर्वत शिखर पर बसा लेह लहु लुहान हो जाता है।

जंगलों में जानवरों को भोजन नहीं मिल रहा है। पीने का पानी नहीं मिल रहा। गांवों को छोड़ कर लोग शहर की ओर भाग रहे हैं और शहर वाले नेता कहते हैं गांवों के लोग शहर में आकर झुग्गी-झोपडिय़ां बनाकर बीमारियां फैलाते हैं।

हाथी-शेर कहां जायें? कीट पतंगे कहां रहें? चिडिय़ां कहां बसेरा ले? गांव के लोग कहां जायें। गांवों की खेती की जमीन पर कल-कारखाने खड़े होने लगे हैं। जहां फसलें लहलहाती थी, आज वहां कारखाने धुआं उगल रहे हैं। कल तक जहां गांव के बगीचे थे वहां अब शहर वालों की बहुमंजिली इमारतों का जंगल है।

आज ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक उष्णता) से सारा संसार त्रस्त है। भारत वर्ष में 4 ऋतुयें हैं गर्मी, जाड़ा, पतझड़ और वसंत। चारों मौसमों की अलग अलग विशेषता है। हर मौसम तीन महीने का होता है मगर अब गर्मी का मौसम 8 महीने का हो गया हैं। जाड़े का मौसम तो महज दो महीना ही रहता है। लोगों के सूट अलमारी से निकल ही नहीं पाते है।

पहले चारों मौसमों का आनंद हम उठाते थे। गांव-गांव छोटे मोटे जंगल व नदियां बहती थी। गांव के बगीचों में कोई न कोई उत्सव त्योहार होता रहता था।

अब गांव उजाड़ होने लगे हैं। जब गांव नहीं रहे, तब क्या शहर बच पायेंगे? क्या कल-कारखाने चल पायेंगे। क्या दाल किसी कारखाने में पैदा होगी? क्या गेहूं धुआं उगलने वाले कल कारखाने पैदा करेंगे। ये कार, ये टी. वी. ये मोबाइल, ये कम्प्यूटर क्या हमें भोजन दे पायेंगे।

जब बादल पानी नहीं देगा और धरती की धरा अंगारों से भरी होगी, तब लोग कहां से लायेंगे पानी?

क्या दुनियां की सरकारें इस मुद्दे पर गंभीर हैं कि वे अपने देश के लिए दाना-पानी कहां से कैसे जुटा पायेंगे? हमारे देश में तो राजनीति सोना उगल रही है, चावल दाल गेहूं की क्या जरूरत है। जब तक जनता नेता की छाती पर सवार होकर अपने जनतंत्र का झंडा नहीं लहरायेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं होगा।

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