( बचपन की गलियां)
नन्हें-नन्हें लड़खड़ाते कदमों से
गुजरते थे जहाँ,
घर-आंगन में अठखेलियां करते थे जहाँ,
माँ के आंचल में पिता के कांधे पर
शिर रखकर सुकून मिलता था
सारे जहाँ का,
याद आती हैं वो माँ की लोरियां
और बचपन की गलियां,
मासूम मन की शरारतों से
निश्छल सी अपनी मुस्कुराहटों से
जीत लेते थे सबकी दिलों-जाँ
बन जाते थे सबके जीवन का अरमाँ,
याद आती हैं अपनी वो नादानियां
और बचपन की गलियां ।
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