अनजान सफ़र
चले जाता हूँ सुने सड़कों पर
सैंकड़ो की भीड़ में यूँ अकेला
अनजान राहों की मस्तियों में
एक अनजान सफ़र की ओर अकेला
पत्थरों की ठोकर ने, घर की याद यूँ दिलाई
पीछे मुड़कर देखा तो मैंने बहुत
पर घर की राह, अब थोड़ी भी नजर न आई
बदगुमानी के उस आलम को छोड़ निकला था मैं
जहाँ लोगो का मान,कौड़ियों में बिकता है
सोचा था न लौटूंगा कभी
सोचा था न लौटूंगा कभी
जहाँ इंसान,इंसानों में ही बिकता है |

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