सोचने से दृष्टी नहीं मिलती ,सोचना अज्ञात का हो नहीं सकता ,जो ज्ञात नहीं उसे हम भला सोचे भी तो कैसे ? सोचना तो ज्ञात के भीतर परीभ्रमण है |
सत्य अज्ञात है ऐसे ही अज्ञात है जैसे अंधे को प्रकाश अज्ञात हो , अँधा लाख चाहे तब भी प्रकाश के बारे में क्या जान पाएगा |
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आँख की चिकित्सा होनी चाहिए आँख खुलनी चाहिए | अँधा जब तक दृष्टा न बने तब तक सार हाथ नहीं लगेगा | भगवान गौतम बुध्द ने अपने अनुयायियों से कहा की सत्य के ज्ञान के लिए स्वयं आगे आये |
इस बात का स्मरण रहे की गौतम बुध्द दृष्टा बनने पर जोर दे रहे है और वे नहीं चाह्ते है की लोग दर्शन के उआपोल में उलझे | इसलिए भगवान गौतम बुध्द ने कहा की तुम अपना दीपक खुद बनो ,क्योंकि दुसरो के दीपक से तुम्हारा दीपक नहीं जलेगा |
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