भगवान से वरदान माँगा था की दुश्मनों से पीछा छुडवा दो |
अचाक देखा थो दोस्त कम होते गये |
जितनी भीड़ बढ़ रही है जमाने में
लोग उतने ही अकेले होते जा रहे है ||
इस जमाने के लोग भी कितने अजीब है ना
सारे खिलोने छोडकर जज्बातों से खेलते है |
तारीख हजार साल में , बस इतनी सी बदली है
तब दौर पत्थर का था ,अब लोग पत्थर के हो गये |
स्वर्ग का सपना छोड़ दो ,नर्क का डर छोड़ दो
कौन जाने क्या पाप ,क्या पुण्य ?
किसी का दिल न दुखे ,अपने स्वार्थ के लिए |
बाकी सब कुदरत पर छोड़ दो ||
सफर का मजा लेना हो तो
अपने साथ सामान कम रखा करो |
जिन्दगी का मजा लेना हो तो
दिल में अरमान कम रखा करो |
दुनिया में दर्दमंद कम मिलते है
काम के लोग चंद मिलते है |
जब आता है मुसीबत का समय
तो सबके दरवाजे बंद मिलते है |
कौन किसके करीब होता है
अपना अपना नसीब होता है |
जो भी गर्दिश के समय काम आये
वो ही सच्चा हबीब होता है |
क्षमा कितनी खुशनसीब होती है
जिसे पाकर लोग अपनों को याद करते है |
अहंकार कितना बदनसीब होता है
जिसे पाकर लोग अक्सर अपनों को ही भूल जाते है ||
बहुत खुश नसीब होते है ,
वो जिन्हें समय और समझ एक साथ मिलते है |
मगर समय पर समझ नहीं आती और जब समझ आती है तो
समय हाथ से निकल जाता है |
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