बड़े मशहूर इस शहर के
सुंदर कोने में एक मकान है |
मकान की बगल की रेट पर
कुछ लहू के निशान है |
वो चंद बुँदे खून की
जमीन में समाना चाहती है
पर कमबख्त हवा है बैरी
उन्हें अपने साथ बहा ले जाती है
इस कश्मकश , इस द्वन्द में
ये बेचारी बुँदे पिस जाती है
उनसे पूछो तो कहेगी
हम फिर से उन गलियों में दौड़ना
चाहती है |
चंद लम्हों के फेर ने
उनका वजूद उनसे छीन लिया ,
उस शहर के सब अखबारों में
अब एक क्या और तीन क्या |
वो बुँदे अब ताजा न रही
अब आधा खुद को पाती है
आँखे उनकी है नही
पर रुआंसी जरुर हो जाती है|
इस शहर से अब डर लगता है
ये शहर बहुत सुनसान है
पर अब भी इस शहर के
उस सुदूर कोने में वो मकान है |
आस-पास लोगो से पूछा
तो बोले की रहते इसमें कुछ इन्सान है
पर उस नासमझो को क्या पता
वहाँ अब बस खून के निशान है |
Comments
Post a Comment