संस्कारो का न होने दे पतन Essay on Moral Education in Hindi


संस्कारो का न होने दे पतन




आप अपने समाज को ही क्यों , अपने घर और अपने पड़ोस को देख ले | आपको एहसास हो जायेगा की हम हकीकत के किस दौर से गुजर रहे है | हम सब मानते है की अतीत के युग अच्छे रहे होंगे , पर हमारे लिए तो आखिर वही काम आएगा जिस युग में हम स्वयं जन्मे है | अतीत की अच्छाईयों की हम तारीफ करेंगे ,उससे प्रेरणा लेंगे ,उन्हें अपने जीवन में जीने की कोशिश करेंगे ,पर हम आदर्श के चक्कर में यथार्थ को दरकिनार तो नहीं कर सकते |

हमारी सरकारे भी हमारे देश के सांस्कृतिक पतन का कारण रही है किसी समय किसी भी फिल्म में कोई एक सामान्य सा सेक्सी द्र्श्य दिखाया जाता तो उस पर सेंशर बोर्ड बैठा दिए जाते थे | सामाजिक संस्थायें ऐसे दृश्यों पर क़ानूनी करवाई करने को आगे बढ़ जाती थी | पता नहीं , अब वे बोर्ड और संस्थाए कहाँ चली गई है ? अब तो शायद ही ऐसी कोई फिल्म होती हो जिसमे सेक्स न हो ,शराब न हो ,अपराध या आतंक न हो | आखिर हर फिल्म के पीछे ये सब बाते ताने बाने की तरह क्यों गुथी हुई रहती है ?

आज का युग टी.वी. और कंप्यूटर का युग है | इसीलिए जैसा सिनेमा इन्टरनेट पर दिखाया जायेगा ,युग वैसा ही निर्मित होगा | आज जितना ज्ञान –विज्ञान विकसित हुआ है , मनुष्य उतना ही भोगी और मुर्च्छित हुआ है | विज्ञान ने उसकी आँखे नहीं खोली है बल्कि उसे अंधानुसरण करने की प्रेरणा अधिक दी है | वस्तुतः विज्ञान अंधानुसरण का प्रेरक कतई नहीं है ,लेकिन लोगो ने अंधानुसरण को अपने जीवन में छाया की तरह जोड़ लिया है |

महिलाये जिस हाथ से खाना खाती है ,उसी पर नेलपॉलिश लगा रही है ,जिस मुहँ से भोजन करती है ,उसी पर लिपिस्टिक पोत रही है , सब अपनी चोली –चड्डी दिखाने पर तुले है | ऊपर के कपडे नीचे खिचकते जा रहे है और नीचे के कपडे ऊपर होते चले जा रहे है | ढीले वस्त्रो ने कसावट का दामन् थाम लिया है | नाख़ून ऐसे बढ़ाये जा रहे है जैसे हम देवलोक से नहीं ,असुर लोक से पैदा होकर आए है | प्रश्न यह है की जो कुछ हम कर रहे है ,वह अगर ठीक है तो फिर हमारी संस्कृति और मर्यादा क्या है ? क्या संस्कृति और मर्यादा केवल भाषण और किताबो की बाते रह गई है या मानवता के लिए उनका कोई उपयोग भी है |

नशा नाश की निशानी है | नशा और ऐश की जिन्दगी जीने की मानसिकता के चलते मनुष्य न केवल अपराधी हुआ है वरन बेइंतहा कुंठित भी हो गया है| चिंता ,निराशा ,हीनता ,तनाव ,अवसाद जैसे मानसिक रोग हमारे कुंठित मन के ही परिणाम है |

संयम से जीने वाले लोग सहज ,स्वस्थ और संतुष्ट होते है किन्तु असंयम से जीने वाले लोग रुग्ण ,असंतुष्ट ,स्वार्थपूर्ण और अंधी मनोवृति के होते है |

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