एक पल भी जिन्दगी का व्यर्थ क्यों जाये?
सुन सको तो फिर सुनो संवेदना मेरी ,
कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?
आदमी हो ,आदमी का अर्थ तो जानो ,
जिन्दगी का लक्ष्य क्या स्वयंमेव पहचानो
जब सुगंधित जो करे उसको सुमन कहते है
जलपान तक सीमा रही चौपाय की |
कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?
आग –सी जो धुल ऊपर पैर चलता है ,
बुद्धि से अवरोध दलकर जो सँवरता है ,
वह सहज ही खोजता है मार्ग जीवन का
जिसको रही सुधि स्वत्व की अभिप्राय की |
कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?
जो किसी से दान में उत्थान पाता है ,
व्यक्ति वो हाँ में उसी की हाँ मिलाता है ,
बुदबुदाये यों लगे ज्यों खोलने से भी
खुलती न खिड़की ज्ञान की संकाय की |
कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?
एक पल भी जिन्दगी का व्यर्थ क्यों जाये ?
जो किए सत्कर्म वे ही मंजिल पाये ,
विश्व उनको याद करता है सदा जग में
जो अनय –भय के दमन को सामने आये |
किसको पता है क्या अवधि है साय की ?
कब तक तजोगे राह तुम अन्याय की ?
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