उम्मीदों की कोंपल
मन की पीड़ा ,
क्यों थाम लेती है
अश्को को दामन
अंखियो से लगती है
झड़ी जैसे सावन की |
रिश्तो की बगिया में
आ गया मौसम
क्यों पतझड़ का ,
रूठे हुए प्यार का |
अलगाव की आँधी
खोखला कर रही है
आपसी रिश्तो की जड़ो को
छोटो को , बड़ो को |
झरने दो स्वार्थ के पते
टूटने दो मधुमखियो के छते
अपने ही आँगन में |
लहू बना नहीं
अब तक पानी
एक जुडाव
अब भी बाकी
शेष है कहानी |
बस अपने ह्रदय में
प्रेम की उम्मीदों की कोंपल
फूटने दो |
पतझड़ पीछे छुट गया है ,
छुटने दो |
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