पढ़िए साड़ी की दास्तान - साड़ी पर कविता

 साड़ी की दास्तान - साड़ी पर कविता



क्या बताऊं मैं, बहुत अच्छा लगता है जब एक साधारण कपड़े से सज धजकर बाहर निकलती हूं साड़ी बनकर।  कई जगह में बिकने जाती हूं।

सोकेस पर एक बेजुबान औरत पर मैं नमूना के तौर पहना दी जाती हूं। बुरा लगता है तब जब सब लोग मुझे टूक टूक देखते है,दाम पूछते है और चले जाते है।

अरे....साड़ी को क्या मैनें बनाया है ?दाम तो दुकानदार ने दी है, बनाया तो मुझे डिजाइनर ने है रंग कारिगरों ने दी है और पल भर में प्यार करने वाले खरीददार मुझे छोड़कर चले जाते है।

कई दिनों तक बेजुबान औरत के खूबसूरती का ताज बनी रही।  मेरी ऊपर जो धूल जमी रही उसके ऊपर जैसे ही दुकानदार की नज़र पड़ी बस जोर से मुझे एक कपड़े से मारकर धूल साफ़ करता रहा मैं चिल्लाई की धीरे धीरे पर मेरी आवाज़ कौन सुनता मैं भी तो इस बेजुबान औरत की तरह गूंगी थी।

एक दिन एक सुंदर सी औरत आई मुझे खरीदने मुझे भी बहुत खुशी मिल रही थी कि चलो अब मैं इस दुकान की कैद और बेजुबान औरत की खूबसूरती के हिस्से से फूर होकर। मेरे असली मालकिन के साथ जाऊंगी और उसके खूबसूरती का हिस्सा बनूंगी।

मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा पर मेरी सांस अटक रही थी बंद डब्बे में कैद जो हो गई थी पर खुशी थी कि नई जगह में सुरक्षा के साथ रहूंगी आखिर मेरी मालकिन मुझे बहुत प्यार से खरीद लाई थी।

जब जब मालकिन मुझे पहनती थी मुझे खुद पर नाज़ होता था कि चलो मैं किसी की सुंदरता में चार चांद तो लगा पा रही हूं।सब मालकिन से ज्यादा मेरी तारिफ़ करते थे।

एक दिन मालकिन मुझे साफ़ करने का जिम्मा अपने सहायिका को सौंप गई थी वह दिन ही मेरे जीवन का अंतिम दिन बन गया।सहायिका ने मुझे ऐसा साफ़ किया कि मैं साफ़ तो हो गई परंतु मशीन में धूलने के वजह से मैं फट गई।

मालकिन को जैसे यह बात पता चली उन्होंने सारा गुस्सा मुझपर उतार दिया मुझपर तेल छिड़क कर मेरे अस्तित्व को मिटा डाला।जलते जलते मैं बहुत तड़प रही थी और कोस रही थी कि मुझे सचमुच किस ने बनाया और क्यों?हर बार की तरह क्यों लोग मुझ पर अन्याय करते है और मेरी पीढ़ा नहीं समझते हैं...क्यों?

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