अध्यात्म में अनुभूति का महत्व
सृष्टि के प्रत्येक जीव में एक ही चेतना शक्ति कार्य कर रही है ,जिसे आत्मतत्व कहते है | चूँकि आत्मतत्व सभी का एक ही है इसीलिए जगत के सभी जीव एक दुसरे के भाई बन्धु है , लेकिन सभी जीवो की प्रकृति और स्वभाव अलग-अलग होते है प्रकृति माया के वशीभूत होकर व्यवहार करती है इसलिए जीवो में काम , क्रोध ,लोभ ,अहंकार ,घृणा ,राग ,द्वेष आदि विकार भी आ जाते है | कहने का तात्पर्य यह है की आत्मतत्व की एकता के कारण हमे सभी से प्रेम करना है और प्रकृति के विकारो के कारण सभी से सावधान रहने की भी आवश्यकता है |
जब मनुष्य को संसार से पूर्ण वैराग्य हो जाता है तब उसे सत्य का बोध होता है और सत्य का बोध होने के बाद उस व्यक्ति को जगत में भगवान स्वयं लीला करते हुए दिखते है, उसकी भेद दृष्टी भी समाप्त हो जाती है | ऐसे मनुष्य को फिर शास्त्रीय बातो की आवश्यकता नहीं रहती है | उसका स्वयं का जीवन और उसके अनुभव एक चलता फिरता और बोलता हुआ शास्त्र बन जाता है | वह जो कुछ भी कहता है – सत्य ही होता है जीवन का सत्य भी एक है , अलग –अलग नहीं है |
भगवन बुद्ध कहते थे – कोई बात इसलिए मत मान लो क्योंकि वह मैं कह रहा हूँ या पुस्तको में लिखा है , बल्कि आप स्वयं अनुभव करो “अप्प दीपो भव:” अर्थात अनुभूति –अनुभूति
अनुभूति ही मनुष्य को पूर्णता तक पहुंचाती है और स्वयं के अनुभव का ही आध्यात्म में महत्वपूर्ण स्थान है | सिर्फ दुसरो की कही और सुनी हुई बातो से कोई भी मनुष्य पूर्णता को उपलब्ध नही हो सकता है | इसका मतलब थ कदापि नही है की शास्त्रों में कुछ गलत लिखा है | मैं स्वयं शास्त्रों का गुरुजनों का सम्मान करता हूँ लेकिन यह भी जानता हूँ की आध्यात्मिक उपलब्धि सिर्फ ध्यान –भजन या किसी साधना का परिणाम नहीं है बल्कि यह तो स्वयं के अनुभव का विषय है जो की प्रभु कृपा से होता है |
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