परिंदे (Parinde)
कभी - कभी सोचता हूँ
क्या होता होगा उन परिंदों का ,
जिनके घर नहीं होते ,
राह तो होती है ,
मगर सफर नहीं होते ,
लगता है शाम को ही उड़ जाते है वो ,
महफूज ठिकानो को ,
मगर इन सर्द रातो में ,
ठिकाने महफूज नहीं होते ,
लगता होगा उन्हें खोंफ इन अंधेरो से ,
इसलिए वो रुक तो जाते है ,
पर सो नहीं पाते ,
सुना है वो परिंदे रोज निकलते है ,
घर बनाने को ,
मगर ,बगैर तिनको के सहारे वो ये
कर नहीं पाते |
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