मैं एक नारी हूं- नारी पर कविता

 

मैं एक नारी हूं


रात के अंधेरे में निकलने से अब डर लगता है,


कहीं अंधेरे में कुछ अनहोनी हो गई तो,


कल कटघेरे में सर झुकाकर मैं रहूंगी,


मेरा गुनेहगार खुले आम सर उठाकर घूमेगा,


हज़ार लोगों के सवालों के घेरे में मैं रहूंगी,


मैं,पूंछती हूं क्यों?


मेरी गलती क्या थी जो रात के अंधेरे में मेरी बली चढ़ गई।


कोई कहेगा मेरे पहनावे में दोष था,


दोष मेरा नहीं उस दानव के नज़रों में था,पर किसी ने यह नहीं कहां।


अंधेरी रात में किसी ने मेरी आबरुह को चोट पहुंचाई,


फिर पूरे अदालत में विपक्ष के वकिलों ने घिनौने सवाल ने।


न कोई कोना है जहां मैं सुरक्षित हूं,


नेता वादे करते है सुरक्षा की पर मैं तो परिवार के साथ भी असुरक्षित हूं।


क्या मैं सुरक्षित हूं,नहीं।


सदियों से मेरे इज्जत को लूटा जा रहा।


सब चुप है,जुल्म हो रहे है।


कानून ढीली है,जहां की,वहां पल पल गुजारना अब मुश्किल है।


कब होंगी सुरक्षित मैं......


 

मैं नारी आखिर कब तक डरकर जिऊंगी मैं.....?

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